Category: My Poems

My Poems

अब मेरे बोलने की बारी है

कविता स्वयं बोलती है कविता-संदर्भ : पटना, 2019। यहाँ बोलने वाली स्वयं कविता है। उसने उन सबकी बात समेटी है जिन्हें बोलने नहीं दिया गया — युवजन, वृद्धजन, माँ, कृषक, विस्थापित — और फिर पाया कि बंदिश तो उस पर भी लगा दी गई है : शिल्प की, रुचि की, दरबार की, सत्ता की। कविता […]

My Poems

बिहार की आवाज़

बिहार की आवाज़ आइए, हवा का रुख बदल दें कल ट्रेन भर – भर कर जाती थीं आज ट्रेन भर – भर कर आयी हैं और कल ट्रेन भर – भर कर जाएँगी पर उनमें अब लोग न होंगे होंगी केवल ज्ञान की पोटरियाँ अन्न, फल और सब्जियाँ अंडे, वस्त्र और मछलियाँ आइए, हवा का […]

My Poems

चर्मकार

हम चर्मकार हैं , दुनिया का दुःख दर्द मिटाते रहते हैं।                                          हम कर्मकार हैं , व्यर्थों में भी अर्थ ढूँढते रहते हैं तुम तो नर को कंधा देकर नामों निशाँ मिटा देतेपशुओं को कंधा दे […]

My Poems

सृजनवादी गीत

हम शिक्षु हैं सृजनवाद के हमें सदा ही बढ़ना है नई सोच और नई दिशाएँ हर दिन नित पल गढ़ना है देख के चीजें आस-पास की, हम इसकी पहचान करें क्या होता है, कैसे क्या हो, इसका हम अनुमान करें। उत्तर देते आये अब तक , प्रश्न हमें अब करना है। हम शिक्षु ————————————————– कण-कण […]

My Poems

सूर्य को अर्घ्य

– चार दिनों के कठोर तप के बाद गंगा के पानी में खड़ा होकर माँ ने छठ घाट पर सबको जब सूर्यदेव को अर्घ्य देने को कहा तो आधुनिक विज्ञान पढ़नेवाला ईश्वर विरोधी बच्चा चिल्लाया ‘नहीं देता अर्घ्य’ । उसने चुनौती के अंदाज में कहा हे सूर्यदेव, बताओ तुम्हें देव क्यों कहूँ ? क्यों करूँ […]

Creative Learning My Poems

सृजनगीत गाएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ नव वर्ष में हम सृजनगीत गाएँ । हर क्षण नया हो हर पल नया हो सब कोई यहाँ तो सृजन कर रहा हो सृजन की तो ऐसी धारा बहाएँ सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ। हरेक व्यक्ति शिक्षु हरेक व्यक्ति शिक्षक लर्निंग समाज सृजनता का पोषक अब ऐसा समाज बना के दिखाएँ सृजनगीत […]

My Poems Underprivileged

रमुआ से अब राम बना दो

एक विनती तो है ये भगवन मेरी प्रार्थना स्वीकार करा दो पैरवी पैगाम जैसे हो लेकिन रमुआ से अब राम बना दो। चाह नहीं मैं हलुआ पूरी मुर्ग मुसल्लम खाकर सोऊँ पर माँड़ भात साग से हरदिन मेरे पेट की आग बुझा दो। चाह नहीं कि सूट टाई से सजकर घर से बाहर जाऊँ पर […]

My Poems

प्रकृति का रक्षक-कोरोना

बाग में घूमते हुए मिल गए कोरोना जी छोटे से ठिगने से एक किनारे चुपचाप दुबके हुए कौतूहलवश पूछ बैठा हे विश्व सम्राट तुम तो विचित्र हो अदृश्य हो अविनाशी हो सर्वद्रष्टा हो सर्वव्यापी हो सर्वशक्तिमान हो पर पता नहीं तुम हो कौन चुपचाप दुबके बैठे हो कुछ तो बताओ तुम कौन हो, कैसे हो […]

My Poems Underprivileged

घर वापसी

पूरे जीवन की सम्पत्ति को बोरे में बाँधकर अपनी इच्छा अरमानों की बलि चढ़ाते हुए दूध मुंहे बच्चे को गोद में लेकर पत्नी के साथ एक श्रमिक ने घर वापसी के लिये राज मार्ग पर जैसे ही अपने पाँव आगे बढ़ाए

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