कविता स्वयं बोलती है
कविता-संदर्भ : पटना, 2019।
यहाँ बोलने वाली स्वयं कविता है। उसने उन सबकी बात समेटी है जिन्हें बोलने नहीं दिया गया — युवजन, वृद्धजन, माँ, कृषक, विस्थापित — और फिर पाया कि बंदिश तो उस पर भी लगा दी गई है : शिल्प की, रुचि की, दरबार की, सत्ता की। कविता माँग करती है कि उसके मुँह का ताला और हाथों की बेड़ियाँ हटा दी जाएँ — अपने लिए नहीं, इसलिए कि सत्य उद्घाटित हो सके, मूक अपनी आवाज़ रख सकें, गूँगे बोल सकें; और वह सबकी आवाज़ बन सके — खेतों की, खलिहानों की, जानवरों की, पृथ्वी की, आसमान की।
एक : समेटा है मैंने
समेटा है मैंने युवजन की आकांक्षा, वृद्धजन की पीड़ा।
सहेजा है मैंने माँ की ममता, कृषक की वेदना, विस्थापितों के छालों की कराह।
समेटा है मैंने वह भी, जो कभी शब्द बना ही नहीं —
गूँगे की आँखों का प्रश्न,
बाँझ खेत की दरार,
चारे को तरसते बैल की टूटी टाँग,
कटते पेड़ की आख़िरी सरसराहट,
धुएँ में खोए आसमान की खाँसी,
और इस पृथ्वी का वह बुख़ार, जो किसी थर्मामीटर पर नहीं, नदियों पर पढ़ा जाता है।
सब मेरे भीतर है। पर सुनने वाला कोई नहीं — क्योंकि मुझे बोलने नहीं दिया गया।
दो : मैं कौन हूँ
पूछते हो, मैं कौन हूँ?
मैं वहीं जन्मी थी जहाँ वाणी हार जाती है।
जब माँ के पास शब्द नहीं थे, तो मैं लोरी बनकर आई।
जब हल जोतते हाथों के पास समय नहीं था, तो मैं बिरहा बनकर खेत की मेड़ पर बैठी।
जब कबीर के पास पोथी नहीं थी, तो मैं साखी बनकर उनके करघे पर उतरी।
जब गंगा के घाट पर अर्घ्य उठा, तो मैं काँच ही बाँस के बहँगिया बनकर गूँजी।
मैं कविता हूँ — उनकी ज़बान, जिनकी ज़बान नहीं होती।
तीन : बंदिश
पर एक दिन मुझ पर भी बंदिश लगा दी गई।
मुँह पर ताला जड़ा गया — कहा गया :
सजो, पर बोलो मत;
रिझाओ, पर चुभो मत;
छंद में रहो, पर चीख़ में नहीं;
दरबार में गाओ, चौराहे पर नहीं।
कहा गया — कविता का काम सुंदर होना है, सच होना नहीं।
हाथों में बेड़ियाँ डाली गईं — पुरस्कार की, प्रशंसा की, पाठ्यक्रम की व्याख्या की।
हाथ उठ सकते थे — केवल ताली के लिए,
फैल सकते थे — केवल माला के लिए;
पर किसी गिरते हुए को थामने के लिए नहीं,
किसी छीनते हुए को रोकने के लिए नहीं।
और मैं — जो गूँगों की आवाज़ बनने आई थी — ख़ुद गूँगी कर दी गई।
चार : अब
अब मेरे बोलने की बारी है।
हटा दो मेरे मुँह के ताले, हटा दो हाथों की बेड़ियाँ।
अपने लिए नहीं माँगती —
इसलिए माँगती हूँ
कि सत्य उद्घाटित हो सके,
कि मूक अपनी आवाज़ रख सकें,
कि गूँगे बोल सकें —
और जो बरसों से केवल सुना गया,
वह एक बार कहा जा सके।
मेरे मुँह का ताला केवल मेरा नहीं है —
उसमें बंद है हर वह मुँह, जिसे ‘चुप’ कहकर बैठा दिया गया।
पाँच : सबकी आवाज़
खोल दो — तो मैं सबकी आवाज़ बनूँगी।
खेतों की, जो दरारों में पानी माँगते हैं;
खलिहानों की, जहाँ अनाज तो है, पर दाम नहीं;
जानवरों की, जिनकी पीड़ा का कोई थाना नहीं;
नदियों की, जो अपने ही किनारों में बंदी हैं;
पेड़ों की, जिनकी हत्या को ‘विकास’ लिखा जाता है;
चिड़ियों की, जिनका आकाश तारों में बँट गया;
पृथ्वी की, जो अपनी ही संतानों से जल रही है;
और आसमान की — जिसे अब बच्चे किताबों में नीला पढ़ते हैं, खिड़की से नहीं।
बनूँगी उस बेटी की आवाज़, जो जन्म से पहले लौटा दी गई;
उस मज़दूर की, जिसका नाम शिलालेख से छूट गया;
उस बूढ़े की, जिसकी अर्ज़ी अलमारी में पीली पड़ गई;
उस बच्चे की, जो पूछना चाहता था, पर डर गया।
जिस-जिसकी ज़बान छीनी गई, मैं उस-उसकी ज़बान बनूँगी।
छह : चेतावनी
और सुनो —
जिस दिन मैं बोलूँगी,
उस दिन छंद मत पूछना, अलंकार मत गिनना, रस मत तोलना।
जब गूँगा बोलता है, तो उसका हर शब्द छंद होता है;
जब खेत बोलता है, तो उसकी दरार ही अलंकार है;
जब पृथ्वी बोलती है, तो एक ही रस बचता है — सत्य।
मैं सजने नहीं आई थी। मैं कहने आई थी।
हटा दो मेरे मुँह के ताले, हटा दो हाथों की बेड़ियाँ —
अब मेरे बोलने की बारी है॥
शब्दार्थ : बिरहा — भोजपुरी-अवधी अंचल का लोक-गीत, जो प्रायः खेत-खलिहान और श्रम के बीच गाया जाता है • साखी — कबीर के दोहों की संज्ञा; ‘साक्षी’ से • काँच ही बाँस के बहँगिया — छठ का पारंपरिक गीत
— विजय प्रकाश (Vijoy Prakash)
पटना, 2019
