पहाड़िया कॉन्क्लेव, पाकुड़ में संबोधन — विजय प्रकाश, पूर्व उपायुक्त, साहिबगंज (1989–91)
1. संबोधन और भूमिका
इस संगोष्ठी के मुख्य अतिथि, पाकुड़ के उप विकास आयुक्त श्री अरविन्द कुमार लाल जी, पाकुड़ ज़िले के ज़िला स्तरीय पदाधिकारीगण, 4S एवं अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं के पदाधिकारी तथा प्रतिनिधिगण, पहाड़िया समाज के सरदार, नायब, माँझी और प्रधान, गाँव-गाँव से आई हमारी माताएँ और बहनें, और मेरे नौजवान साथियो — आप सबको मेरा जोहार!
आज पाकुड़ की इस धरती पर खड़ा होना मेरे लिए सम्मान की बात है। यह राजमहल की पहाड़ियों की धरती है। यह उस समाज की धरती है जो इन पहाड़ों पर तब से बसा है, जब यहाँ न कोई ज़िला था, न कोई सरकार, न कोई नक़्शा।
साथियो, इस धरती से मेरा रिश्ता पुराना है। 1989 से 1991 तक मैं साहिबगंज का उपायुक्त था। तब पाकुड़ साहिबगंज ज़िले का ही हिस्सा था। उन दो वर्षों में मैं सैकड़ों पहाड़िया गाँवों में गया — पहाड़ चढ़कर, टोले-टोले। मेरी पत्नी मृदुला और बच्चे भी साथ रहते थे, ताकि इन परिवारों से हमारा रिश्ता सरकारी नहीं, पारिवारिक बने।
उन गाँवों ने मुझे जो सिखाया, वह किसी किताब ने नहीं सिखाया। उस समय हमने कोशिश की कि हर पहाड़िया परिवार का अपना घर हो। ये घर उन्होंने ख़ुद बनाए — अपनी पसंद के डिज़ाइन और अपनी पसंद की सामग्री से। उन्होंने मिट्टी के घर बनाए, और उनमें रहे भी। पहाड़िया आदिवासी महोत्सव शुरू किया, ताकि इस समाज की कला और संस्कृति को मंच मिले। दो सौ से अधिक गाँवों की टीमों ने इसमें भाग लिया। 73 मंच बने, जिन पर उन्होंने अपनी कला दिखाई। पूरा आयोजन स्वयंसेवा के आधार पर हुआ। लोगों का उत्साह ऐसा था कि स्वयंसेवकों ने स्टेडियम के बगल के पहाड़ पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘पहाड़िया आदिवासी महोत्सव’ लिख दिया, ताकि साहिबगंज से ट्रेन में गुज़रने वाला हर यात्री दूर से ही इस आयोजन के बारे में जान सके। मृदुला जी ने मंच के सामने क़रीब 250 फ़ुट लंबी और 6 फ़ुट चौड़ी मिथिला चित्रकला बनाकर मंच की सज्जा की थी। इनकी सांस्कृतिक टीमों को प्रदर्शन के लिए दिल्ली भी भेजा गया। गाँव की बहनों को ‘स्वास्थ्य सखी’ बनाया, ताकि सेहत की पहली जानकारी गाँव में ही मिले और मरीज़ सही समय पर अस्पताल पहुँच सके।
और एक बात मुझे आज भी सबसे प्रिय है। ग्राम सभा की ताक़त समझाने के लिए पहाड़िया साथियों ने अपनी माल्तो भाषा में एक फ़िल्म बनाई — ‘पुने आसरा’। वह माल्तो भाषा की पहली फ़िल्म थी। उस दिन मैंने समझा कि जो बात अपनी भाषा में कही जाती है, वह सीधे दिल तक पहुँचती है। यह फ़िल्म हाटों के वीडियो हॉलों में मुफ़्त दिखाई गई। लोग अपने ही बीच के लोगों को पर्दे पर देखकर रोमांचित हो उठते थे। इससे गाँव-गाँव में ग्राम सभा बनाने में बड़ी मदद मिली, और ग्राम सभाओं के ज़रिए लोगों तक ऋण और बीज पहुँचाना आसान हुआ।
पहाड़िया की उगाई बरबट्टी से बनी खाने की चीज़ें हमने हर आयोजन में रखीं। यहाँ तक कि अपने बच्चों के जन्मदिन पर भी बरबट्टी के ही पकवान परोसे। ये सारी स्मृतियाँ आज भी मुझे रोमांचित करती हैं।
आज पैंतीस साल बाद मैं फिर आपके बीच हूँ। इसलिए जो कहूँगा, एक अफ़सर की तरह नहीं, इस समाज के एक पुराने साथी की तरह कहूँगा।
साथियो, आज हम यहाँ शिकायत करने नहीं आए हैं। हम हिसाब करने आए हैं। हिसाब इस बात का कि जिस समाज ने इन पहाड़ों को बचाया, जंगल को बचाया, झरनों को बचाया — उस समाज को बदले में क्या मिला?
आज मैं आपसे तीन शब्दों पर बात करूँगा। ये तीन शब्द नारे नहीं हैं। ये पहाड़िया की साँस हैं — जल, जंगल और ज़मीन।
जल नहीं तो जीवन नहीं। जंगल नहीं तो रोज़ी नहीं। ज़मीन नहीं तो पहचान नहीं। और जब ये तीनों ख़तरे में हों, तो समझ लीजिए कि पूरा समाज ख़तरे में है।
2. पहचान और इतिहास: पहाड़ के पहले बाशिंदे
साथियो, पहले यह याद कर लें कि पहाड़िया समाज कौन है।
सौरिया पहाड़िया हों या माल पहाड़िया — यह समाज संथाल परगना का सबसे पुराना समाज है। जब अंग्रेज़ इस इलाक़े में आए, तो सबसे पहले उनसे टकराने वाला पहाड़िया ही था। 1857 से बहुत पहले, संथाल हूल से भी पहले, इन्हीं पहाड़ों से अंग्रेज़ी राज को चुनौती मिली थी।
संथाल परगना का गज़ेटियर बताता है कि 1771 में वॉरेन हेस्टिंग्स ने लगभग आठ सौ जवानों की विशेष टुकड़ी बनाई और कैप्टन ब्रुक को ‘जंगल तराई’ का मिलिट्री गवर्नर बनाकर पहाड़िया को दबाने भेजा। ब्रुक ने क़िले तोड़े, पर भरोसा उसने बंदियों और उनके परिवारों से अच्छे बर्ताव से जीता, और पहाड़ के नीचे 283 गाँव बसाए। उसके बाद कैप्टन ब्राउन ने पहाड़िया की अपनी व्यवस्था — सरदार, नायब और माँझी — को मान्यता देने की योजना बनाई। और भागलपुर के कलेक्टर क्लीवलैंड ने इसी रास्ते पर चलकर, बिना ख़ून बहाए, पहाड़िया का भरोसा जीता; पहाड़िया उन्हें ‘चिलिमिली साहब’ कहते थे। सीख साफ़ है: पहाड़िया को बल से नहीं, सम्मान से जीता गया।
बाबा तिलका माँझी — जबरा पहाड़िया — को याद कीजिए। कुछ इतिहासकार उन्हें संथाल मूल का भी मानते हैं। लोक-परंपरा कहती है कि उन्होंने अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ तीर-धनुष उठाया और 1785 में भागलपुर में उन्हें फाँसी दी गई, पर उन्होंने सिर नहीं झुकाया। वे इस देश के पहले स्वतंत्रता सेनानियों में गिने जाते हैं।
बाद में, 1824 से 1833 के बीच, अंग्रेज़ों ने इस इलाक़े की हदबंदी करके उसे नाम दिया — दामिन-ए-कोह, यानी पहाड़ का आँचल। ज़मींदारों के ज़ुल्म से बीरभूम छोड़कर आ रहे संथाल किसानों को 1837 से वहाँ जंगल साफ़ कर बसने का बढ़ावा दिया गया। पहाड़िया पहाड़ के ऊपर सिमटता गया और नीचे की उपजाऊ ज़मीन उसके हाथ से निकलती गई। जो कहानी तब शुरू हुई, वह आज तक रुकी नहीं है।
आज सरकार इस समाज को ‘विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह’, यानी PVTG कहती है। पर मैं कहता हूँ — पहाड़िया कमज़ोर नहीं है। पहाड़िया को कमज़ोर किया गया है। जिससे पानी छीन लो, जंगल छीन लो, ज़मीन छीन लो, वह कमज़ोर नहीं होगा तो क्या होगा?
3. जल: पहाड़ पर पानी का संकट
सबसे पहले पानी की बात।
साथियो, यह कैसी विडंबना है! बारिश सबसे पहले पहाड़ पर गिरती है, और प्यासा भी सबसे पहले पहाड़ ही रहता है। पानी पहाड़ से बहकर नीचे चला जाता है, और पहाड़ पर बसा पहाड़िया गाँव बूँद-बूँद को तरसता है।
लिट्टीपाड़ा और अमड़ापाड़ा के पहाड़ी टोलों में जाकर देखिए। गर्मी आते ही झरने सूख जाते हैं। हमारी माताएँ-बहनें सिर पर घड़ा रखकर एक-दो किलोमीटर नीचे उतरती हैं और फिर खड़ी चढ़ाई चढ़कर लौटती हैं। कई जगह लोग आज भी झरने और चुआँ का वही पानी पीते हैं, जो मवेशी पीते हैं।
और इस गंदे पानी की क़ीमत कौन चुकाता है? हमारे बच्चे चुकाते हैं — डायरिया से, पीलिया से, बार-बार की बीमारी से।
योजनाएँ आईं। चापाकल लगे, पर पहाड़ पर बोरिंग फ़ेल हो गई। सोलर जलमीनार बने, पर मोटर ख़राब हुई तो महीनों कोई देखने नहीं आया। पाइपलाइन की बड़ी योजनाएँ बनीं, पर बरसों बाद भी कई टोलों तक नल नहीं पहुँचा। काग़ज़ पर ‘हर घर जल’ है, ज़मीन पर ख़ाली घड़ा है।
इसलिए जल पर मेरी बात साफ़ है:
- पहाड़ का इलाज पहाड़ के हिसाब से हो। जहाँ बोरिंग नहीं चलती, वहाँ झरनों का संरक्षण हो, चुआँ पक्के हों, और बारिश का पानी रोकने के लिए छोटे चेकडैम और तालाब बनें।
- हर पहाड़िया टोले की गिनती हो — किस टोले में पीने का साफ़ पानी है और किसमें नहीं। यह सूची सार्वजनिक हो।
- जलमीनार और चापाकल की मरम्मत की ज़िम्मेदारी तय हो। गाँव के ही नौजवानों को इसकी ट्रेनिंग और मानदेय मिले।
- पानी की योजना ग्राम सभा से पूछकर बने, दफ़्तर में बैठकर नहीं।
साथियो, जो समाज पानी ढोने में अपना आधा दिन गँवा दे, उसके बच्चे स्कूल कब जाएँगे? पानी का सवाल सिर्फ़ प्यास का सवाल नहीं है। यह हमारी बेटियों के भविष्य का सवाल है।
4. जंगल: अधिकार और आजीविका
अब जंगल की बात।
पहाड़िया के लिए जंगल कोई ‘संसाधन’ नहीं है। जंगल उसका बाज़ार है, उसका दवाख़ाना है, उसका देवस्थान है। कुरवा की खेती, बरबट्टी, मकई, बाजरा, महुआ, साल के पत्ते, जलावन, जड़ी-बूटी — पहाड़िया की पूरी ज़िंदगी जंगल से चलती है। यह मैंने अपनी आँखों से देखा है।
जिस जंगल को इस समाज के पुरखों ने सैकड़ों साल बचाकर रखा, उसी जंगल में आज पहाड़िया को ‘अतिक्रमणकारी’ कहा जाता है। कुरवा खेती करने पर रोक-टोक होती है। लकड़ी लाने पर मुक़दमे का डर दिखाया जाता है। दूसरी तरफ़ लकड़ी के तस्कर रात-रात भर पेड़ काट ले जाते हैं, और उन्हें कोई नहीं पूछता।
साथियो, 2006 में संसद ने वन अधिकार क़ानून बनाया। यह क़ानून कहता है कि जो लोग पीढ़ियों से जंगल में रह रहे हैं, उनका उस ज़मीन पर हक़ है। यह क़ानून गाँव को सामुदायिक वन अधिकार देता है। और PVTG समाज के लिए इसमें एक ख़ास हक़ है — ‘हैबिटेट राइट’, यानी अपने पूरे पारंपरिक इलाक़े पर अधिकार।
पर ईमानदारी से पूछिए — कितने पहाड़िया गाँवों को सामुदायिक वन पट्टा मिला? कितने पहाड़िया परिवारों के दावे आज भी फ़ाइलों में दबे हैं? और कितने दावे बिना कारण बताए ख़ारिज कर दिए गए?
जंगल पर मेरी बात यह है:
- हर पहाड़िया गाँव का सामुदायिक वन अधिकार का दावा अभियान चलाकर तैयार हो और समय-सीमा में निपटे।
- पहाड़िया समाज को हैबिटेट राइट दिया जाए। देश के दूसरे राज्यों में PVTG समाजों को यह हक़ मिला है, तो राजमहल की पहाड़ियों में क्यों नहीं?
- बरबट्टी, महुआ और दूसरी वन उपज का सही दाम मिले। आज बिचौलिया पहाड़ पर आकर औने-पौने दाम में माल उठा लेता है। ख़रीद केंद्र हाट तक आए और दाम सरकार तय करे।
- जंगल की रखवाली ग्राम सभा के हाथ में हो। जिसने जंगल बचाया है, वही उसे आगे भी बचाएगा।
साथियो, जंगल की बात जंगल के जानवरों के बिना अधूरी है। जंगल सिर्फ़ पेड़ों का नाम नहीं है। उसमें पशु हैं, पक्षी हैं, मधुमक्खियाँ हैं, कीट-पतंगे हैं। जंगल से जानवर चले जाएँ, तो जंगल भी ज़्यादा दिन नहीं बचता।
पहाड़िया ने सदियों से इन जीवों के साथ रहना सीखा है। वह जानता है कि किस मौसम में कौन-सा पक्षी आता है और कौन-सा जानवर किस रास्ते से गुज़रता है। यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलता। इसलिए वन्यजीवों का सबसे अच्छा रखवाला वही हो सकता है, जो उनके बीच रहता है।
और जंगल के जीवों से जो उपज मिलती है — शहद, मोम, लाह, तसर के कोए — उस पर पहला हक़ उसी का होना चाहिए, जो उस जंगल को बचाता है। वन अधिकार क़ानून इन्हें लघु वन उपज मानता है और इन पर गाँव को मालिकाना हक़ देता है। ज़रूरत इस हक़ को ज़मीन पर उतारने की है।
वन्यजीवों पर मेरी बात यह है:
- वन्यजीवों की रखवाली में पहाड़िया नौजवानों को वन मित्र और वन रक्षक के रूप में रोज़गार मिले। शिकारी और तस्कर को सबसे पहले वही पहचानता है।
- शहद, मोम, लाह और तसर के संग्रह, प्रसंस्करण और बिक्री पर पहाड़िया ग्राम सभाओं को विशेष अधिकार मिले। लाइसेंस बाहरी ठेकेदार को नहीं, गाँव की समिति को मिले।
- मधुमक्खी पालन, लाह और तसर के लिए ट्रेनिंग, औज़ार और बाज़ार दिया जाए, ताकि जंगल को नुक़सान पहुँचाए बिना आमदनी बढ़े।
- जंगली जानवर फ़सल, मवेशी या जान का नुक़सान करें, तो मुआवज़ा जल्दी और गाँव में ही मिले — दफ़्तरों के चक्कर काटे बिना।
- अवैध शिकार और वन्यजीवों की तस्करी पर सख़्ती हो, और इसकी निगरानी में ग्राम सभा को भागीदार बनाया जाए।
साथियो, जब जंगल बचाने से घर चलता है, तो जंगल अपने आप बचता है।
5. ज़मीन: क़ानून, खनन और विस्थापन
और अब सबसे बड़ा सवाल — ज़मीन।
साथियो, हमारे पास क़ानून की कमी नहीं है। संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, यानी SPT एक्ट, 1949 से लागू है। यह क़ानून साफ़ कहता है कि यहाँ की रैयती ज़मीन न बेची जा सकती है, न ख़रीदी जा सकती है। यह यहाँ के पुरखों की लड़ाई से मिला कवच है।
फिर भी ज़मीन जा रही है। कैसे? दान-पत्र के नाम पर। लीज़ के नाम पर। अँगूठा लगवाकर। क़र्ज़ के बदले। शादी-ब्याह के रिश्ते के बहाने। क़ानून किताब में खड़ा है और ज़मीन हाथ से खिसक रही है।
दूसरी मार खनन की है। पाकुड़ पत्थर के लिए जाना जाता है। यहाँ का पत्थर दूर-दूर तक जाता है, बड़ी-बड़ी सड़कें और इमारतें इससे बनती हैं। पर जिस पहाड़ को तोड़कर यह पत्थर निकलता है, उस पहाड़ पर रहने वाले को क्या मिला? धूल मिली। फटे हुए घर मिले। सूखे हुए झरने मिले। फेफड़ों की बीमारी मिली।
अमड़ापाड़ा के पचुवाड़ा में कोयला निकलता है। कोयला बाहर जाता है, बिजली बाहर जलती है, और विस्थापित गाँव आज भी मुआवज़े, पुनर्वास और नौकरी के वादों का इंतज़ार कर रहा है।
मैं विकास के ख़िलाफ़ नहीं हूँ। पर मैं एक सवाल ज़रूर पूछता हूँ — यह कैसा विकास है जिसमें पहाड़ पहाड़िया का टूटे और घर किसी और का बने?
तीसरी समस्या हक के काग़ज़ की है। बहुत से पहाड़िया परिवार पीढ़ियों से जिस ज़मीन पर रह रहे हैं, उसका काग़ज़ उनके पास नहीं है। पुराने सर्वे में पहाड़ की ज़मीन ठीक से दर्ज ही नहीं हुई। काग़ज़ नहीं तो जाति-आवासीय प्रमाण पत्र नहीं। प्रमाण पत्र नहीं तो छात्रवृत्ति नहीं, नौकरी नहीं, आवास नहीं। एक काग़ज़ की कमी पूरी पीढ़ी को पीछे धकेल देती है।
ज़मीन पर मेरी बात यह है:
- SPT एक्ट का सख़्ती से पालन हो। जो ज़मीन ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से गई है, उसकी जाँच हो और वह असली मालिक को लौटाई जाए।
- पहाड़िया गाँवों का विशेष सर्वे हो और हर परिवार को उसकी ज़मीन का काग़ज़ मिले।
- ग्राम सभा की सहमति के बिना कोई खदान, कोई क्रशर, कोई लीज़ नहीं। पेसा क़ानून की भावना यही है, और इसे ज़मीन पर उतारना होगा।
- अवैध खनन और अवैध क्रशर बंद हों। जो खदान छोड़ दी गई है, उसे भरा जाए — खुले गड्ढे गाँव के बच्चों और मवेशियों की जान ले रहे हैं।
- खनिज से जो पैसा ज़िले के DMFT फ़ंड में आता है, वह सबसे पहले खनन से प्रभावित गाँवों के पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा पर ख़र्च हो।
- विस्थापन से पहले पुनर्वास हो, बाद में नहीं।
6. स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार और पशुपालन
साथियो, जल, जंगल और ज़मीन के साथ चार और बातें जुड़ी हैं। इन्हें छोड़कर बात अधूरी रहेगी।
स्वास्थ्य। मलेरिया, कालाज़ार, टीबी, ख़ून की कमी और कुपोषण — ये बीमारियाँ पहाड़िया गाँवों में आज भी जान ले रही हैं। मरीज़ को खटिया पर लादकर पहाड़ से उतारना पड़ता है, क्योंकि सड़क नहीं है और एम्बुलेंस ऊपर नहीं चढ़ती। कई जानकार चेतावनी दे चुके हैं कि इस समाज की आबादी उस रफ़्तार से नहीं बढ़ रही, जिस रफ़्तार से बाक़ी समाज की बढ़ रही है। यह किसी भी सभ्य देश के लिए ख़तरे की घंटी है।
शिक्षा। पहाड़ पर स्कूल है तो शिक्षक नहीं। शिक्षक है तो वह हमारे बच्चे की भाषा नहीं जानता। बच्चा घर में माल्तो बोलता है और स्कूल में उसे पहले दिन से दूसरी भाषा में पढ़ाया जाता है। नतीजा — बच्चा पाँचवीं से पहले स्कूल छोड़ देता है। पहाड़िया दिवाकालीन और आवासीय विद्यालय मज़बूत हों, और शुरुआती पढ़ाई अपनी भाषा में हो।
रोज़गार। काम नहीं मिलता, तो हमारे नौजवान बंगाल, केरल, दिल्ली की ओर पलायन करते हैं। हमारी बेटियाँ दलालों के झाँसे में फँसती हैं। पहाड़िया नौजवानों के लिए विशेष भर्ती, हुनर की ट्रेनिंग और गाँव में ही काम — यह माँग ख़ैरात नहीं, हक़ है।
पशुपालन। एक बात मैंने इन गाँवों में अपनी आँखों से देखी है। पहाड़िया के पास गायें बहुत हैं, पर वह उनका दूध नहीं पीता। दूध वह बाछी-बछड़ों के लिए छोड़ देता है। यह इस समाज की करुणा है, और मैं इसका सम्मान करता हूँ। पर इसका नतीजा यह है कि गाय पालकर भी परिवार को कोई व्यापारिक लाभ नहीं मिलता। इन गायों से पहाड़िया परिवार को व्यापारिक लाभ कैसे मिले, इस पर हम सबको गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है।
इसलिए रास्ता ऐसा चाहिए, जो इस संस्कार को भी बचाए और घर की आमदनी भी बढ़ाए। भेड़ और बकरी का पालन भी बहुत लाभकारी हो सकता है; ये पहाड़ की ढलानों पर आसानी से पलती हैं। मधुमक्खी पालन के लिए यह जंगल सबसे अच्छी जगह है। साँपों की जो पहचान पहाड़िया को है, उसके बल पर सरकार की अनुमति से सर्प-विष संग्रह की सहकारी समिति बन सकती है, जैसी तमिलनाडु के इरुला आदिवासियों ने बनाई है। अच्छी नस्ल, टीकाकरण, ट्रेनिंग और बाज़ार की व्यवस्था हो, तो पशुधन पहाड़िया परिवार की स्थायी कमाई बन सकता है।
सरकारों ने योजनाएँ बनाई हैं — डाकिया योजना से घर तक अनाज, पीएम-जनमन से आवास, सड़क और बिजली। हम इनका स्वागत करते हैं। पर योजना की गिनती दिल्ली और राँची में होती है, और उसका सच पहाड़ के आख़िरी टोले में दिखता है। पैंतीस साल पहले हमने ग्राम सभा को जगाने के लिए माल्तो में फ़िल्म बनाई थी। आज भी मेरा भरोसा उसी ग्राम सभा पर है — हर योजना का हिसाब ग्राम सभा में पढ़कर सुनाया जाए।
7. सात सुझाव और आगे का रास्ता
साथियो, कॉन्क्लेव तभी सफल है जब यहाँ से एक साफ़ आवाज़ निकले। इसलिए मैं इस मंच से सात बातें रखता हूँ:
- पानी: एक तय समय-सीमा में हर पहाड़िया टोले तक साफ़ पीने का पानी पहुँचे, और उसकी मरम्मत की ज़िम्मेदारी तय हो।
- जंगल: हर पहाड़िया गाँव को सामुदायिक वन अधिकार और पूरे समाज को हैबिटेट राइट मिले। वन्यजीवों की रखवाली में पहाड़िया युवाओं को रोज़गार मिले, और शहद, लाह, तसर जैसी उपज पर पहला हक़ पहाड़िया का हो।
- ज़मीन: SPT एक्ट का सख़्ती से पालन हो, ग़ैर-क़ानूनी ढंग से गई ज़मीन वापस हो, और हर परिवार को ज़मीन का काग़ज़ मिले।
- खनन: ग्राम सभा की सहमति के बिना कोई खनन नहीं; अवैध खदान और क्रशर बंद हों; खनिज का पैसा प्रभावित गाँव पर ख़र्च हो।
- स्वास्थ्य: हर पहाड़िया पंचायत में चलता-फिरता अस्पताल, और मलेरिया, कालाज़ार व कुपोषण के ख़िलाफ़ विशेष अभियान।
- शिक्षा और रोज़गार: अपनी भाषा में शुरुआती पढ़ाई, आवासीय विद्यालयों में सुधार, पहाड़िया युवाओं की विशेष भर्ती, और बकरी, भेड़ व मधुमक्खी पालन को बढ़ावा।
- भागीदारी: पहाड़िया के बारे में कोई भी फ़ैसला पहाड़िया से पूछे बिना न हो।
पर साथियो, एक बात पहाड़िया समाज से भी कहनी है। हक़ माँगने से पहले आपको एक होना होगा। सौरिया और माल का भेद, टोले-टोले का भेद, पार्टी-पार्टी का भेद — इन्हें मंच के नीचे छोड़ना होगा।
ग्राम सभा में जाइए। रजिस्टर देखिए। सवाल पूछिए। अपनी ज़मीन का काग़ज़ बनवाइए। अपने बच्चों को, ख़ासकर बेटियों को, स्कूल भेजिए। और नशे से — हड़िया और दारू की लत से — अपने नौजवानों को बचाइए। जो समाज जागता है, उसका हक़ कोई नहीं दबा सकता।
8. समापन
साथियो, अंत में बस इतना कहूँगा।
पहाड़ सिर्फ़ पत्थर नहीं है। पहाड़ पहाड़िया की माँ है। झरना सिर्फ़ पानी नहीं है, वह पुरखों का आशीर्वाद है। और यह ज़मीन सिर्फ़ मिट्टी नहीं है, यह तिलका माँझी के ख़ून से सींची हुई मिट्टी है।
दो सौ साल पहले बाबा तिलका ने तीर उठाया था। आज तीर नहीं, क़लम, क़ानून और एकता उठानी है। लड़ाई वही है — अपने जल, अपने जंगल और अपनी ज़मीन की।
आइए, आज पाकुड़ की इस धरती से संकल्प लें:
पहाड़ हमारा है — पहाड़ बचाएँगे।
पानी हमारा है — पानी बचाएँगे।
जंगल हमारा है — जंगल बचाएँगे।
ज़मीन हमारी है — ज़मीन नहीं देंगे।
पहाड़िया एकता ज़िंदाबाद!
जोहार! जय झारखंड! जय हिंद!
