दीपावली के लिए एक सृजनात्मक संदेश
प्रस्तावना
दीये जलें, रोशन हो द्वार,
ख़ुशी से महके घर-संसार।
लक्ष्मी पूजें, मंगल गाएँ,
शुभ लाभ का विधान बनाएँ।
बही में सदा लिखते आए,
शुद्ध लाभ के अंक बनाए।
बिक्री से लागत घट जाए,
शुद्ध लाभ बचकर रह जाए।
लिखें 'शुभ', और गिनें बस 'शुद्ध' —
इन दोनों के बीच है युद्ध।
क्या इतना ही लाभ का माप?
क्या इतनी ही प्रगति की नाप?
धन बढ़े — बस इतना ही काम?
या कुछ और भी है परिणाम?
एक : लाभ का नया अर्थ
शुद्ध लाभ तो गणित बताए,
कितना पाया, कितना जाए।
शुभ लाभ का अर्थ है न्यारा,
सबके हित का हो उजियारा।
जो बनाए, उसे लाभ मिले,
जो ख़रीदे, उसे चैन मिले।
श्रम का आदर, धरा का मान,
और समाज को सुख का दान।
लाभ वही, जहाँ सबकी जीत,
ना हारे कोई — यही रीत।
ना कोई ठगा, ना लाचार,
ऐसा हो नया कारोबार।
दो : बनाने वाले का लाभ
जिसके श्रम से यह रूप गढ़ा,
जिस हाथ ने हर पुर्ज़ा जड़ा,
उसे मज़दूरी पूरी मिले,
सम्मान और सुरक्षा मिले।
उत्पादक को भी मिले लाभ,
नए प्रयोग का भी हो ख़्वाब।
श्रम को मिले पूरा सम्मान,
गुणवत्ता से बने पहचान।
मुनाफ़े की हो ऐसी रीत,
मज़दूर के मुख पर भी प्रीत।
श्रम और पूँजी का हो मेल,
सबके हित में चले यह खेल।
तीन : ख़रीदने वाले का लाभ
ग्राहक को हो भरोसा सदा,
न खोटा माल, न तौलें जुदा।
दाम सही, चीज़ भी हो खरी,
कसौटी पर हर वस्तु उतरी।
छल-कपट न हो, न दिखावा हो,
न विज्ञापन का छलावा हो।
दाम का पूरा-पूरा मोल,
और ऊपर से मीठे बोल।
ग्राहक का विश्वास जब बढ़े,
व्यापार का मान तभी चढ़े।
धरा को भी मिले नया प्राण,
पेड़ और नदी का सम्मान।
चार : हम तो न्यासी हैं
इस लाभ में किसका है योग?
मालिक अकेला? ना — सब लोग।
किसी का श्रम तो किसी का धन,
किसी की माटी, किसी का मन।
जिसमें सबका है योगदान,
उसमें सबका हक़ है समान।
हम मालिक नहीं — यह जान लो,
हम न्यासी हैं — यह मान लो।
गांधी का संदेश यही था —
सारा धन समाज का ही था।
जिसको मिला, वह बस सँभाले,
सबके हित में उसे लगा ले।
पाँच : दीये का हिसाब
दीये का हिसाब तो देखो,
फिर अपनी बही में यह लिखो :
तेरी बाती, तेरा ही घी,
पर उजियारा तो सबका ही।
दीया कोई भेद न करता,
अपना-पराया कब जानता।
दीये की बस यही नीति है —
बाँटने में उसकी प्रीति है।
शुद्ध लाभ का हिसाब रखना,
शुभ लाभ का भी ध्यान रखना।
शुद्ध में शुभ का रंग भर दो,
हर अंतस को दीपक कर दो।
शुद्ध से शुभ तक का यह सफ़र,
दीवाली का हो यही असर।
दीवाली में हो यह विचार —
सबका सुख, वही है व्यापार॥
— विजय प्रकाश
पटना, दीपावली 2026
