Vijoy Prakash Blog

Education

सृजनवादी गीत

by on May.17, 2020, under APCL, Creative Learning, Education, My Poems, SCL

हम शिक्षु हैं सृजनवाद के हमें सदा ही बढ़ना है

नई सोच और नई दिशाएँ हर दिन नित पल गढ़ना है

देख के चीजें आस-पास की, हम इसकी पहचान करें

क्या होता है, कैसे क्या हो, इसका हम अनुमान करें।

उत्तर देते आये अब तक , प्रश्न हमें अब करना है।

हम शिक्षु ————————————————–

कण-कण में जो राज छिपा है इसका तो हम ज्ञान करें

नई कल्पना, नये प्रयोगों का हम स्वतः प्रमाण करें।

पाठों को हम रटना छोड़ें, स्वाध्याय अब करना है।

हम शिक्षु ————————————————————

इन्द्रियों पर संयम रखकर मन को हम एकाग्र करें

सत्य अहिंसा का पालन कर अपना आत्म-विकास करें

पुस्तक से आगे बढ़कर अब, योग साधना करना है।

हम शिक्षु ————————————————————

धर्म-जाति का भेद भुलाकर कर्मों का सम्मान करें

शान्ति-प्रेम का वाहक बनकर जन-जन का कल्याण करें।

समता के तो हम हैं साधक, नया विश्व अब रचना है।

हम शिक्षु ——————————————————————-

* स्कूल ऑफ क्रिएटिव लर्निग एवं अन्य सृजनवादी केन्द्रों पर नियमित रूप से गाए जाने वाला मेरे द्वारा लिखित गीत।

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सूर्य को अर्घ्य

by on May.17, 2020, under Education, My Poems

                                                                    - 

चार दिनों के कठोर तप के बाद

गंगा के पानी में खड़ा होकर

माँ ने छठ घाट पर सबको

जब सूर्यदेव को अर्घ्य देने को कहा

तो आधुनिक विज्ञान पढ़नेवाला

ईश्वर विरोधी बच्चा चिल्लाया ‘नहीं देता अर्घ्य’ ।

उसने चुनौती के अंदाज में कहा

हे सूर्यदेव, बताओ तुम्हें देव क्यों कहूँ ?

क्यों करूँ तुम्हारी पूजा?

तुम्हारे लिए अर्घ्य क्यों?

मेरे लिए क्यों नहीं?

अणु परमाणु से बना संसार

सब तो हैं एक समान

सब की संरचना समान

हम तुम भी हैं एक समान

तुम भी प्रोटोन, न्युट्रॉन और इलेक्ट्रॉन

मैं भी प्रोटोन, न्युट्रॉन और इलेक्ट्रॉन

क्यों नमन हो तुम्हारा

क्यों न नमन हो हमारा

तुम्हारे सम्मान में क्यों नदी नाले की हो साफ सफाई

क्यों घाट बाट की साज सज्जा

ऐसी विषमता क्यों

तुम्हारी यह दादागिरी क्यों ?

मैं नहीं मानता तुम्हें देव

मेरा मन नहीं मानता तुम्हें देव।

सूर्य बोल उठा

वत्स,ठीक है तुम्हारा कहना

एक सी है हमारी संरचना

बने सभी अणु परमाणु से

सबमें प्रोटोन, न्युट्रॉन और इलेक्ट्रॉन का ही है जाल

पर एक बड़ा अंतर है

तुम सदैव अपने लिए सोचते हो

अपने लिए करते हो

पर मैं अहर्निश दूसरों के लिए सोचता हूँ

दूसरों के लिए करता हूँ

सदैव चलता रहता हँू

कभी रूकता नहीं

कभी सोता नहीं

कभी आराम करता नहीं

सब करता हँू

दूसरों के लिए

मेरा जीवन उत्सर्ग है दूसरों के लिए

बच्चे ने कहा क्यों बाँगते हो

तुम भी तो रात को सोने चले जाते हो

सूर्य ने कहा

नहीं दोस्त रात दिन तो तुम्हारे लिए हैं

मेरे जीवन का बस एक ही अर्थ है चरैवेति चरैवेति

मैं कभी रूकता नहीं कभी थकता नहीं

सुबह हो या शाम

दिन हो या रात

गर्मी हो या बरसात

हर क्षण हर मौसम

बस चलना ही है मेरा काम।

हर क्षण अपने शरीर को जलाता हूँ

गलाता हूँ

मेरे परमाणु मिट जाते हैं

और बनाते हैं फोटोन

जिन्हें भेजता हूँ धरती पर

कण-कण को ऊर्जान्वित करता हूँ

इसी से पृथ्वी पर जल है

जंगल है

फूल हैं

फल हैं

खेत है

खलिहान है

पहाड़ है

खदान है

इसी से प्रकृति का हर कोना गतिमान है

इसी से जन जन के चेहरे पर मुस्कान है

मेरे पास सम दृष्टि है

मेरे लिए सब समान हैं

जन हो या निर्जन

खग विहग हो या वन

जल हो या थल

गरीब हो या अमीर

राजा हो या रंक

मेरी रश्मियाँ सबके लिए समान हैं

मेरी रश्मियाँ बिमारियों में रामबाण हैं

मेरे पास अहं नहीं,

वहं नहीं

पर दुष्टों के लिए रहम नहीं

सूर्य कहता जा रहा था

मानव मानव रहता है

जब अपना अपना करता है

मानव देव हो जाता है

जब दूसरों के लिए गलता है

पर बच्चे की उत्सुकता का कोई अंत नहीं था

पूछ बैठा माना कि तुम हमसे अलग हो, देव हो

पर यह अर्घ्य क्यों?

मम्मी सुन रही थी उसने बताया

मै बताती हूँ कि अर्घ्य क्यों?

अर्घ्य आभार है सूर्य के प्रति

उसके त्याग का

निष्ठा का

समर्पण का

अर्घ्य प्रदर्शन है

सौर ऊर्जा के उपयोग से बनी जीवनदायिनी सामग्रियों का

फल फूल सब्जियों का

अग्नि से बने पाक पकवान का

अर्घ्य आश्वासन है सूर्य को

उसके द्वारा बनाए गए प्राकृतिक संपदा

जल, थल और वायु को स्वच्छ, संरक्षित और सुरक्षित रखने का

अर्घ्य आराधना है

भविष्य की सुरक्षा हेतु अपने परिजनों के लिए

देश और विश्व के बन्धुओं के लिए

समस्त जनबल और पशुबल के लिए

अर्घ्य प्रार्थना है सभी जीवनदायिनी शक्तियों का

जीवन के आधार को सतत गतिमान रखने के लिए

अर्घ्य संकल्प है मानवीय एकजुटता का

रंग, जाति, धर्म और देश की सीमाओं से परे

प्राकृतिक शक्तियों के साथ खड़े होने का

अर्घ्य प्रतीक है

प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का

सहचरी का

सहजीवन का

माँ की वाणी कठोर हो गयी थी

उसने चेतावनी के अंदाज में कहा

याद रखो जबतक सूरज चलता है

तभी तक मानव जिंदा है

बच्चे और माँ आपस में उलझे थे

पर सूर्य चला जा रहा था

अपने शास्वत अंतहीन कर्त्तव्य पथ पर

त्याग के

तपस्या के

निष्ठा और समर्पण के ।

बच्चा अवाक था

निरुत्तर था

सहसा बड़बड़ाने लगा

माँ मैं भी देव बनूँगा

माँ मैं भी देव बनूँगा

माँ मैं भी अर्घ्य दूँगा

माँ मैं भी अर्घ्य दूँगा

और हाथ जलपात्र की ओर उठ गए थे

सूर्यदेव को अर्घ्य देने को।

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सृजनगीत गाएँ

by on May.17, 2020, under Broadstreaming Education, Creative Learning, Education, Education for Democracy, My Poems

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ

नव वर्ष में हम सृजनगीत गाएँ ।

हर क्षण नया हो हर पल नया हो

सब कोई यहाँ तो सृजन कर रहा हो

सृजन की तो ऐसी धारा बहाएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ।

हरेक व्यक्ति शिक्षु हरेक व्यक्ति शिक्षक

लर्निंग समाज सृजनता का पोषक

अब ऐसा समाज बना के दिखाएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ

हरेक हो पूजित हरेक श्रम सम्मानित

न कोई भूखा न कोई हो शोषित

समानता की ऐसी बहार चलाएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ।

न जाति का झगड़ा न धर्मों का रगड़ा

हर जगह हो केवल शांति का पहरा

राजनीति की ऐसी तो गंगा बहाएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ।

हरेक जीव पूरक हरेक है सहयोगी

आजादी हरेक के लिए है उपयोगी

ऐसी आजादी सबको दिलाएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ।

व्यक्ति से ज्यादा समूह जरूरी

स्पर्द्धा से ज्यादा सहयोग जरूरी

संबंधों की ऐसी तो दुनिया बनाएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ।

जीवन का धरती से गहरा है नाता

सृजन ही धरती को स्वर्ग बनाता

धरती पर स्वर्ग ले के तो आएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ।

पृथ्वी तो है सब जीवों की थाती

इससे ही बचेगा जीवन मेरे साथी

पृथ्वी को कल से बेहतर बनाएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ।

हर मन का अंधेरा भाग गया हो

हर हृदय में एक दीप जला हो

सृजन की दुनिया बनाके दिखाएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ।

सृजन से ही है आनन्दों का नाता

सृजन ही मानव को मानव बनाता

चलो आज मानव को मानव बनाएँ

सृजनगीत गाएँ सृजनगीत गाएँ।

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Broadstreaming, not Mainstreaming

by on Jan.31, 2010, under APCL, Broadstreaming Education, Education, Issues related to Transgenders, Musahars, Organisations, Presentations, Publications, Rat Farming, Rehabilitation of Beggars, Underprivileged

‘Broadstreaming, not Mainstreaming’ – An Approach towards Solutions for Inclusive Development was delivered at XLRI, Jamshedpur as inaugural address in the conference on ‘Solutions to Inclusive Development’ on January 29, 2010.

Download the presentation.

Broadstreaming, Not Mainstreaming


 

 

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How to start a game?

by on May.15, 2009, under APCL, Books, Creative Learning, Education, Organisations, Publications, SCL

Creative Learning requires development of activities in the form of games. In order to organise these activities, we should adopt the prevalent methods of collecting players, choosing leaders, making pairs or teams, etc. We shall first discuss the general principles involved in these activities.

 For a PDF of the same, click Creative Learning Games I

Collecting Players

Before starting a game, the first task is to collect players. Two or three children decide as to which game is to be played. Then they join hands and go on chanting in loud voice by shaking joined hands up and down.

 

We want to play Queenie, Queenie.

We want to play Queenie, Queenie

Who wants to play Queenie, Queenie.

Who wants to play Queenie, Queenie.

Or

Come and join, come and join.

Join the ring, join the ring.

 

(Replace Queenie, Queenie by the name of the game played).

 

On hearing the chanting the children interested in playing “Queenie, Queenie” join hands and start chanting. This way the voice becomes louder and louder. The process continues till the required number of children have given consent to play the game.

(continue reading…)

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Read stories from the first day

by on Apr.22, 2009, under APCL, Books, Creative Learning, Education, Multiple Intelligence, Organisations, Publications, SCL

(Excerpt from the book Creative Learning by Vijoy Prakash)

One of the interesting findings of researches on learning is that the child should be exposed to reading books from quite early in life. This process should start as early as possible without even waiting for the child to show responses to the stimuli. Now it is also being suggested that a child should be read a story or shown pictorial stories right from his/her birth, when he/she returns from the hospital. It may appear that the child is not responding to the story or is not looking at the storybook, but gradually, it would be realised that the faculty of reception sharpens. It has been found that if a child is read a storybook right from birth, he/she may start reading the book right from the age of 3-4 years.

Similarly, if a child is exposed to songs, tunes and rhythms right from birth, s/he becomes more receptive to the rhythmic tunes. If a child were shown more and more pictures from early childhood, his/her spatial intelligence would be more developed in comparison to the child who is not shown any such pictures. Since information is received through sensory organs, all sensory organs should be fully developed to receive information. Hence, games and activities must be designed for developing all sensory organs in early childhood.

Grandma’s Techniques
Many children show great reluctance in eating. There is an age-old tradition to make various designs of ‘rotis’ (breads) for children. Some breads will look like animals, for example, goat, or birds like parrot, or in some geometrical designs. These designs are not only suited to the temperament of the child to facilitate eating, it also makes them learn about various animals, birds, geometrical designs, etc.. Even if the child may be reluctant to eat, he eats the bread, when it is presented in the form of some geometrical design. Many parents further facilitate eating by linking the design to some story. For example, they may narrate a story of a bird and present the bread in the form of the bird to the child.

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Dining Time Interaction

by on Apr.22, 2009, under APCL, Books, Creative Learning, Education, Multiple Intelligence, Organisations, Publications, SCL

(Excerpt from the book Creative Learning by Vijoy Prakash)

Dining time is another great occasion for learning. Dining together in a family situation is helpful not only in binding the family together, it helps in understanding likes and dislikes of family members also. It is also useful in effecting emotional closeness among family members.

Traditionally, mother and grandmother used to remain present during dining time of the children and other persons, even if they were not dining themselves. This was helpful in showing concern for the family members.

Dining time interactions can be an extremely useful period for learning. This period could be used for

• Learning the experiences of the children during the day in the school and outside.
• Telling the experience of parents during the day.
• Telling the history of the family and the village.
• Discussion on the problems encountered during the day by different members of the family and possible solutions thereof
• Story/puzzle/jokes telling session by children/parents
• Discussion on any news items or important events of the day.

(continue reading…)

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Interact with children during bedtime

by on Apr.19, 2009, under APCL, Books, Creative Learning, Education, Publications, SCL

(Excerpt from the book Creative Learning by Vijoy Prakash)

When young infants go to bed, they expect their parents to be with them. This is a good occasion to interact with them. It has been seen that songs and stories narrated to them at this time have great impact on the development of their brains. Earlier, we had folk stories for these occasions. Now, as parents are living in a nuclear situation and are generally extremely busy people, most of them do not remember these stories. As such, they are not able to make best use of these occasions. There is an urgent need to collect such stories or to write new stories and supply them to young couples.

Shampa learns Hanuman Chalisa at 3 years

Shampa was born in a middle class family. When she was a child of 3 years, her mother Sharda Sinha, a teacher educator, used to sing Hanuman Chalisa (40 couplets in the praise of Lord Hanuman), when she went to sleep. She used to start singing, when she was going to sleep and continued till she was fast asleep. As a result, Shampa learnt Hanuman Chalisa by heart, even at the age of 2 years, which is a commendable feat for any child. Today Shampa is a teacher at Teacher’s Training College, Patna. She feels that such techniques used by her mother had a great impact on her life.

(continue reading…)

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Develop family as the first school

by on Apr.19, 2009, under APCL, Books, Creative Learning, Education, Organisations, Publications, SCL

(Excerpt from the book Creative Learning by Vijoy Prakash)

Family is said to be the first school, but we have done little to develop it as the first school. Swami Dayanand had identified father, mother and teacher to be the three pillars of education of a child. In Satpatha Brahman it was said,

matriman pitrimanaachryavan purusho ved
(A man is knowledgeable, if he is under the guidance of  learned mother, father, and teacher.)

Unless all pillars are equally strong, the child cannot be said to be properly educated. Today couples get married. They also have children. But, they are never trained in the methods of rearing the children. They are never told how they should steer the child in the elementary stages of learning. It has now been established that about 90% of the development of brain take place before the end of 5 years. Since couples do not know how to take care of the child, they depend mainly upon hit and trial methods. Thus, children may not attain full development of brain as per their own potential.  As such, they are not fully prepared to take advantage of the learning system, when they enter the school system.

(continue reading…)

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